मुंबई, प्रतिनिधि।
प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। इसके प्रभावी विकल्प के रूप में राज्य सरकार ने बांस की खेती और उससे बने उत्पादों को बढ़ावा देने का निर्णय लिया है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने के उद्देश्य से बांस उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार उपलब्ध कराने पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है। साथ ही किसानों और आदिवासी समुदाय को बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित करने तथा उनके उत्पादों को मॉल में बिक्री के लिए स्थान उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। यह जानकारी राज्य के वन मंत्री गणेश नाईक ने विधानसभा में दी।
विधानसभा में सदस्य चेतन तुपे और राजकुमार बडोले ने प्लास्टिक के कारण पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव को कम करने और बांस उद्योग को प्रोत्साहन देने के संबंध में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा था, जिस पर मंत्री गणेश नाईक ने जवाब दिया।
मंत्री गणेश नाईक ने बताया कि राज्य में किसानों और आदिवासी समुदाय के बीच बांस की खेती को लेकर व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। किसानों को मुफ्त बांस के पौधे उपलब्ध कराने के साथ तीन वर्षों तक आर्थिक सहायता भी दी जा रही है। रोजगार गारंटी योजना के तहत प्रति हेक्टेयर लगभग 7 लाख रुपये तक की सहायता दी जाएगी। एक हेक्टेयर भूमि के लिए 500 पौधे और गैप फिलिंग के लिए 100 अतिरिक्त पौधे दिए जाते हैं। साथ ही टिश्यू कल्चर के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है। पहले वर्ष प्रति पौधा 90 रुपये, दूसरे वर्ष 50 रुपये और तीसरे वर्ष 35 रुपये का अनुदान दिया जाएगा।
उन्होंने बताया कि बांस बोर्ड और औद्योगिक विकास महामंडल के माध्यम से बांस आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। एक इकाई के लिए करीब 10 लाख रुपये तक का ऋण सहायता उपलब्ध कराया जा रहा है। बांस से बने खिलौने, फर्नीचर, पत्रावली और द्रोण जैसे उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण केंद्र भी शुरू किए जा रहे हैं। साथ ही इन उत्पादों की बिक्री के लिए मॉल में जगह उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जा रहा है।
मंत्री गणेश नाईक ने कहा कि वन विभाग की खाली पड़ी जमीनों पर बांस की खेती बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। बुरुड समाज को गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध कराने के लिए सरकार सजग रहेगी और कच्चे माल की कमी होने पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई भी की जाएगी। बुरुड समाज के युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उनकी पारंपरिक कला को बाजार से जोड़ने का भी प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि राज्य के लगभग 12 हजार गांवों में संयुक्त वन प्रबंधन योजना लागू है। वन उपज की बिक्री से प्राप्त राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा गांव के विकास कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है। ग्राम पंचायत, वन विभाग और स्वयंसेवी संस्थाओं के समन्वय से बांस की खेती को और अधिक बढ़ावा देने की योजना है।
इस चर्चा में विजय वडेट्टीवार, नाना पटोले, शेखर निकम, राजू तोडसाम, किशोर जोरगेवार और डॉ. विनय कोरे सहित कई सदस्यों ने भाग लिया।















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