यह घटना उस गहराई से जुड़ी है, जो भारतीय सेना की धर्मनिरपेक्ष भावना और आपसी सद्भाव को दर्शाती है। जब एक मुस्लिम पोर्टर ने भीषण हिमपात और कठिन परिस्थितियों के बीच अपने धार्मिक कर्मकांड को निभाया, तब साथी सैनिकों ने सम्मानपूर्वक उसे न केवल स्थान दिया, बल्कि उसकी आस्था के लिए पूर्ण समर्थन भी दर्शाया। यह एक ऐसा दृश्य था जहाँ युद्ध जैसी कठोर व्यवस्था के बीच भी सहिष्णुता, समझ और सहयोग की एक दुर्लभ मिसाल देखने को मिली।
भारतीय सेना न केवल भौगोलिक सीमाओं की रक्षक है, बल्कि यह विविधताओं में एकता की सच्ची प्रतीक भी है। हर जवान, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो, जब वर्दी पहनता है, तो वह केवल सैनिक नहीं, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक आत्मा का संवाहक भी बन जाता है। यह घटना यही बताती है कि “आस्था” का सच्चा रूप किसी पूजा-पद्धति या रीति-रिवाज में सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें एक गहरी मानवीय समझ, परस्पर सम्मान और करुणा भी समाहित होती है।
ऐसे अनुभव न केवल सेना के अंदरूनी ताने-बाने को मजबूत करते हैं, बल्कि समाज को यह सिखाते हैं कि विविधता में एकता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि व्यावहारिक और सशक्त सच है। यह उदाहरण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है कि जब व्यक्ति एक-दूसरे की आस्था को समझता है, तो न केवल कार्यक्षमता बढ़ती है, बल्कि आपसी विश्वास और भाईचारा भी प्रबल होता है – और यही है भारत की असली ताकत।
इस अनुभव से पता चलता है कि “आस्था” सिर्फ व्यक्तिगत विश्वास नहीं, बल्कि मानवता, सहयोग और आध्यात्मिक सहिष्णुता का संकल्प भी हो सकती है।















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