विकास की ऊंची उड़ान, पर शिक्षा की कटी पतंग!

विकास की ऊंची उड़ान, पर शिक्षा की कटी पतंग!

मोनिका भोसले

महानगरों की चकाचौंध, एक्सप्रेस वे के जाल और बढ़ते बुनियादी ढांचे के बीच शिक्षा के क्षेत्र से आई एक हालिया रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को झकझोरने के लिए काफी है। ‘यूडीआईएसई प्लस’ (UDISE+) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक रूप से देश के सबसे अग्रणी राज्यों में शुमार महाराष्ट्र में माध्यमिक स्तर अर्थात कक्षा ९वीं और १०वीं पर बच्चों का ड्रॉपआउट रेट चिंताजनक रूप से बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस स्तर पर लड़कों का ड्रॉपआउट रेट लगभग १२.६ प्रतिशत और लड़कियों का १०.३ प्रतिशत तक पहुंच गया है। ये आंकड़े महज एक संख्या नहीं हैं, बल्कि ये हमारे पूरे शैक्षिक ढांचे, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं की गहरी खाइयों को उजागर करते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि विकास की इस तेज दौड़ में हमारा एक बड़ा तबका आज भी पीछे छूट रहा है।

यह तो सच है की, प्राथमिक स्तर (कक्षा १ से ८वीं) तक शिक्षा के अधिकार और मुफ्त भोजन जैसी योजनाओं के कारण बच्चों को स्कूलों में रोके रखने में तो कामयाबी मिली है, लेकिन जैसे ही छात्र माध्यमिक स्तर पर कदम रखते हैं, व्यवस्था की कमियां सतह पर आ जाती हैं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आज भी माध्यमिक स्कूलों की दूरी एक बड़ी समस्या है। सुरक्षित परिवहन के अभाव में कई अभिभावक अपनी बेटियों को आगे पढ़ाने से कतराते हैं। इसके अलावा, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है; करीब ४० प्रतिशत से अधिक स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूल शौचालयों का अभाव है, और किशोरियों के लिए स्वच्छता सुविधाओं की कमी उनके स्कूल छोड़ने की एक बड़ी वजह बनी हुई है। वहीं शहरी क्षेत्रों की बात करें, तो मुंबई जैसे महानगरों में भी पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले आधे बच्चे भी १०वीं तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते चलन और आर्थिक तंगी के कारण गरीब परिवारों के बच्चे बाल श्रम या घरेलू कामों में धकेल दिए जाते हैं।

यदि हमें वास्तव में एक सुदृढ़ और न्यायसंगत समाज का निर्माण करना है, तो इस ड्रॉपआउट रेट को रोकने के लिए आपातकालीन स्तर पर कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, मुफ्त पाठ्यसामग्री, यूनिफॉर्म और मध्याह्न भोजन जैसी कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाकर इन्हें कक्षा १०वीं तक अनिवार्य किया जाना चाहिए। जिन दूर-दराज के क्षेत्रों में स्कूल बेहद दूर हैं, वहां छात्राओं के लिए मुफ्त बस पास या साइकिल जैसी योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाना होगा। इसके साथ ही, माध्यमिक स्तर से ही शिक्षा को रोजगारोन्मुखी और कौशल विकास से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि गरीब परिवारों को पढ़ाई एक बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का सुरक्षित निवेश लगे।

वैसे हकीकत तो यह है कि, चमचमाते फ्लाईओवरों और मेट्रो लाइनों का विकास तब तक अधूरा है, जब तक हमारे समाज का आखिरी बच्चा स्कूल की दहलीज तक न पहुंचे; सरकार और समाज दोनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि बुनियादी सुविधाओं और आर्थिक तंगी के कारण किसी भी बच्चे के सपनों की उड़ान बीच में न थमे।

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