६ साल का ‘बैकलॉग’ और जनप्रतिनिधियों की ‘अग्निपरीक्षा’:क्या फिर लौटेंगे नवी मुंबई के सुनहरे दिन?

अर्चना त्रिपाठी

नवी मुंबई के विकास पथ पर ३० मार्च २०२६ का दिन इतिहास के पन्नो पर लिखा जायेगा। पिछले ६ वर्षों से, कोरोना महामारी और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण, शहर का बजट केवल ‘प्रशासकों’ की फाइलों तक सीमित था। लेकिन इस वर्ष, जब ₹6,704 करोड़ का बजट पेश किया, तो वह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि नवी मुंबईकर नागरिकों की ‘आकांक्षाओं का घोषणापत्र’ बनकर उभरा।

पिछले पांच-छह वर्षों में, जब शहर में नगरसेवक और महापौर नहीं थे, तब विकास की गति कहीं न कहीं ‘मैकेनिकल’ हो गई थी। प्रशासन ने बजट तो पेश किए, लेकिन उनमें जनता की सीधी भागीदारी और वार्ड स्तर की छोटी-बड़ी समस्याओं की संवेदना गायब थी।

ऐसी परिस्थिति में नवी मुंबई महानगरपालिका की इस नई निर्वाचित बॉडी के लिए सत्ता संभालते ही बजट बनाना किसी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं था। यह सब जानते है की पिछले ६ वर्षों से शहर का प्रशासन पूरी तरह से अधिकारियों के हाथ में था, जिससे ज़मीनी स्तर की राजनीति और प्रशासनिक निर्णयों के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई थी। नई बॉडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—पिछले ६ वर्षों के अधूरे विकास कार्यों को पटरी पर लाना और साथ ही भविष्य की नई आकांक्षाओं को बजट में जगह देना।

एक तरफ ६ साल का ‘बैकलॉग’ था और दूसरी तरफ नागरिकों पर बिना कोई नया टैक्स लादे विकास को गति देनी थी। आय के सीमित स्रोतों के बीच ₹6,700 करोड़ से अधिक का प्रावधान करना और उसे संतुलित रखना एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल मांगता था।

प्रशासक राज के दौरान लिए गए कई निर्णयों को जनहित में बदलना और अधिकारियों की कार्यशैली को फिर से जनता के प्रति जवाबदेह बनाना एक कठिन कार्य था। नई बॉडी ने इस बजट के माध्यम से न केवल फंड का आवंटन किया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अब शहर की प्राथमिकताएं एसी कमरों में नहीं, बल्कि जनता के बीच तय होंगी।

जनता का प्रशासन पर से जो भरोसा पिछले कुछ वर्षों में कम हुआ था, उसे फिर से कायम करने के लिए यह बजट एक ‘सेतु’ का काम कर रहा है। ₹111 करोड़ की वार्ड विकास निधि और अनधिकृत निर्माणों के दंड में भारी कटौती जैसे निर्णय यह साबित करते हैं कि नई बॉडी ने अपनी पहली ही पारी में जनता की नब्ज को सही तरीके से पकड़ा है।

“६ साल के अंतराल के बाद, नई बॉडी ने इस बजट के माध्यम से नवी मुंबई के विकास की रुकी हुई घड़ी को फिर से ‘टिक-टिक’ करने की ऊर्जा दी है।”

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