अर्चना त्रिपाठी
लोकतंत्र की प्रयोगशाला में समय-समय पर ऐसे प्रयोग होते हैं, जो गंभीर विमर्श से ज्यादा मनोरंजन की खुराक दे जाते हैं। इस बार राजनीतिक मंच पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के पदार्पण ने बुद्धिजीवियों और चाय की चुस्कियां लेने वाले रणनीतिकारों को एक नया विषय दे दिया है। पहली नजर में यह नाम सुनकर किसी को भी कीटनाशक विभाग की याद आ सकती है, लेकिन राजनीति के चतुर सुजान जानते हैं कि इस नाम के पीछे की प्रतीकात्मकता कितनी गहरी है। विज्ञान कहता है कि दुनिया में परमाणु हमला भी हो जाए, तो कॉकरोच एक ऐसा जीव है जो बच निकलेगा। शायद पार्टी के संस्थापकों ने भी यही सोचकर यह नाम चुना होगा कि चाहे देश में कोई भी लहर आए, दल-बदल का मौसम हो या गठबंधन की उठापटक, उनकी पार्टी हर राजनीतिक आपदा में टिकी रहेगी।
आज के दौर में जहां बड़े-बड़े और स्थापित दलों के पास हाईटेक वॉर-रूम, चमचमाते दफ्तर और असीमित संसाधन हैं, वहां ऐसी किसी अनोखी पार्टी का आना यह साबित करता है कि राजनीति में अब भी ‘क्रिएटिविटी’ की भारी गुंजाइश बची हुई है। जनता भी अब पारंपरिक और घिसे-पिटे चुनावी वादों से ऊब चुकी है। ऐसे में एक ऐसी पार्टी जो नाम से ही अपनी अदम्य जीवन शक्ति का परिचय दे रही है, वह मतदाताओं के बीच कौतूहल का विषय तो बन ही गई है। देखना यह होगा कि क्या यह दल केवल नाम की नवीनता तक सीमित रहेगा या फिर समाज के उन ‘कीट-पतंगों’ यानी आम आदमी की आवाज बनेगा, जिसे व्यवस्था अक्सर हाशिए पर धकेल देती है।
बहरहाल, चुनावी राजनीति की डगर बेहद पथरीली है। यहाँ स्थापित दिग्गज नए खिलाड़ियों को पैर जमाने का मौका आसानी से नहीं देते। ऐसे में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को केवल नाम के सहारे नहीं, बल्कि धरातल पर उतरकर काम करना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि जनता का विश्वास जितना किसी बहुमंजिला इमारत के कोने में छिपने जितना आसान नहीं है; इसके लिए धूप में पसीना बहाना पड़ता है। आने वाले चुनावों में यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि यह नया दल राजनीति के कदम रखता है, या फिर यह भी सोशल मीडिया की रील्स और मीम्स की तरह एक क्षणिक मनोरंजन बनकर रह जाता है।













Leave a Reply