लातूर के वडार समाज के ब्रह्मदेव लस्करे… जिनके हाथ भले ही नहीं हैं, लेकिन उनके हौसले लोहे से भी ज्यादा मजबूत हैं। MPSC अधिकारी बनने का उनका जुनून किसी भी विपरीत परिस्थिति से बड़ा है। यही कारण है कि संघर्ष के बीच भी वे अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते रहे।
उनके इसी जुनून और सपने को साकार करने के लिए आगे आए हैं—स्व. देविदास चौगुले प्रतिष्ठान और एडवोकेट साहिल चौगुले, जिन्होंने ब्रह्मदेव के लिए सचमुच एक देवदूत की भूमिका निभाई है।
एडवोकेट साहिल चौगुले ने सामाजिक दायित्व निभाते हुए ब्रह्मदेव की MPSC कोचिंग की सालाना फीस, रहने, खाने और अन्य आवश्यक खर्चों की संपूर्ण जबाबदारी प्रतिष्ठान के माध्यम से उठाई है। उनका उद्देश्य स्पष्ट है—
“हाथ भले ही किस्मत ले गई हो, पर लड़ने की ताकत, ज्ञान की ज्योत और मंज़िल तक पहुंचने की ज़िद कभी कम नहीं होनी चाहिए।”
ब्रह्मदेव लस्करे की कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि उम्मीद, जिद और उन लोगों की संवेदनशीलता का उदाहरण है, जो मुश्किल हालात में किसी का हाथ बनकर उसके भविष्य को संवारते हैं।
ऐसे सामाजिक उपक्रम समाज को प्रेरणा देते हैं कि—
हौसले अगर मजबूत हों, और कोई देवदूत साथ मिल जाए… तो मंज़िल कभी दूर नहीं रहती।














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