हर दिन नवी मुंबई के सिग्नलों पर जब वाहन रुकते थे, तो उन्हीं वाहनों के बीच छोटे-छोटे हाथ भीख मांगते, गजरे, फूल और खिलौने बेचते नज़र आते थे। धूप, धूल और संघर्ष से भरे इन बच्चों के जीवन में किताबों की खुशबू तो दूर—शिक्षा का नाम भी अनजान था। लेकिन आज वही बच्चे, जिन्हें कभी सिग्नल की तपती धूप पहचानती थी, अब यूनिफॉर्म पहनकर मुस्कुराते हुए “गुड मॉर्निंग टीचर” कहते नज़र आ रहे हैं।
नवी मुंबई के सिग्नलों पर अपना बचपन खो रहे इन बच्चों के जीवन में शिक्षा की रोशनी लाने और उनका जीवनस्तर बदलने के उद्देश्य से, नवी मुंबई महानगरपालिका और समर्थ भारत व्यासपीठ की संवेदनशील पहल के माध्यम से नेरुल शाळा क्रमांक 102 — कर्मवीर भाऊराव पाटिल माध्यमिक विद्यालय में नवी मुंबई की पहली “सिग्नल स्कूल” शुरू की गई है। यह स्कूल सिर्फ एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि उन मासूम चेहरों के लिए उम्मीद की नई शुरुआत है, जिन्होंने अब तक दुनिया को सिर्फ सिग्नल पर रुकते हुए देखा था।
आज जो हाथ कभी सिक्के गिना करते थे, वे अब कॉपी, किताब और पेंसिल संभाल रहे हैं। यहां के बच्चे हिंदी वर्णमाला, कंप्यूटर ज्ञान, खेल, गतिविधियाँ और यहां तक कि रोबोटिक्स की ट्रेनिंग भी ले रहे हैं। उनकी आँखों में अब संघर्ष नहीं, बल्कि भविष्य के सपनों की चमक दिखाई देने लगी है।
जून 2025 में शुरू हुई इस सिग्नल स्कूल में 45 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं— जिनमें 25 लड़कियाँ और 20 लड़के शामिल हैं। इनमें से 27 बच्चे बालवाड़ी में हैं, जबकि पहली से चौथी कक्षा तक लगभग 10 बच्चे और पाँचवी से छठी कक्षा तक 7–8 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं।
मनपा की स्कूल बस प्रतिदिन इन बच्चों को उनके निवास स्थान से लेकर स्कूल तक पहुँचाती है। यहाँ बच्चों को नहलाने, यूनिफॉर्म देने और पौष्टिक नाश्ता कराने की व्यवस्था मनपा द्वारा की जाती है। वर्तमान में चार शिक्षिकाएँ, दो काउंसलर, दो सफाईकर्मी और दो सुरक्षा रक्षक बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।
सिग्नल स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों ने बताया कि इस पहल ने उनके जीवन में कितना बड़ा बदलाव लाया है और उन्हें सीखने में कितना आनंद आ रहा है। वहीं शिक्षिकाओं ने भी साझा किया कि शुरुआत में बच्चों को पढ़ाना बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अब ये बच्चे शिक्षा के महत्व को समझते हुए अनुशासन और उत्साह के साथ सीख रहे हैं। शिक्षक गर्व के साथ बताते हैं कि वे इन बच्चों के भविष्य को सही दिशा देने में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि म्हापे क्षेत्र की बस्तियों में सर्वे कर बच्चों का चयन किया गया और अभिभावकों की अनुमति से उन्हें स्कूल में दाखिला दिया गया। इससे न केवल बच्चों का जीवन बदल रहा है, बल्कि परिवारों में भी शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।
नवी मुंबई की यह पहली सिग्नल स्कूल सिर्फ एक विद्यालय नहीं—
यह उन बच्चों के लिए आशा की किरण है, सपनों की उड़ान है, और एक विश्वास है कि ‘लाल बत्ती से लेकर ब्लैकबोर्ड तक’ का सफर अब उनके उज्ज्वल भविष्य को मजबूत आधार देगा।












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