रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जून के पहले सप्ताह में अपने विदेशी विनिमय भंडार में $5.17 अरब की वृद्धि दर्ज की है, जिससे कुल भंडार राशि $696.65 अरब तक पहुंच गई है । यह सुधार मुख्यतः सोने और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (FCA) की मजबूती के कारण हुआ है, जो पिछले कुछ हफ्तों में गिरावट के बाद आया है। इस सकारात्मक प्रवृत्ति से वित्तीय स्थिरता को मजबूती मिली है, और भारत की आयात क्षमताओं एवं बाहरी आशंकाओं से लड़ने की क्षमता बढ़ी है।
हालाँकि, यह भंडार अभी भी पिछले वर्ष सितंबर में दर्ज की गई उच्चतम राशि $704.89 अरब से लगभग $8.3 अरब नीचे है । लेकिन RBI गिने-चुने कमजोरी के बावजूद भी 11 महीने तक के आयात और बाहरी ऋण के 96% तक कवरेज करने की स्थिति में है । आने वाले समय में वैश्विक बाजार और भारतीय मौद्रिक नीतियों के आधार पर रिज़र्व पुनः आगे बढ़ने की उम्मीद है।
यह बढ़ा हुआ भंडार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत बैकअप के रूप में काम करता है, खासकर उस समय जब वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी अनिश्चितताएँ बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भंडार न केवल निवेशकों के लिए विश्वास बढ़ाने का कार्य करता है, बल्कि रुपए की अस्थिरता को भी सीमित करता है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों की भागीदारी को प्रोत्साहन मिलने की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे शेयर और बांड बाजार में स्थिरता बनी रह सकती है।
भविष्य में यदि वैश्विक ब्याज दरें स्थिर होती हैं और तेल की कीमतों में अस्थिरता नियंत्रित रहती है, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और अधिक सुदृढ़ हो सकता है। इसके अलावा, रिज़र्व बैंक द्वारा की जा रही विनिमय दर हस्तक्षेप और निर्यात क्षेत्र में सुधार जैसे कारक भी इस वृद्धि को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इस आर्थिक मजबूती के साथ भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में एक भरोसेमंद उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करता दिख रहा है।











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