संपादकीय: वन महोत्सव — रस्म अदायगी से परे जीवन बचाने का जन-आंदोलन

संपादकीय: वन महोत्सव — रस्म अदायगी से परे जीवन बचाने का जन-आंदोलन

मोनिका भोसले
हर साल जुलाई के पहले सप्ताह में मनाया जाने वाला ‘वन महोत्सव’ महज एक सरकारी कैलेंडर का हिस्सा या प्रतीकात्मक रस्म अदायगी नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल वॉर्मिंग और कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होती हमारी धरती को नया जीवन देने का एक सालाना अनुष्ठान है। सन 1950 में तत्कालीन कृषि मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है, जब इंसान रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, गिरते भूजल स्तर और प्रदूषित हवा का दंश झेल रहा है। इस महोत्सव के दौरान हर साल देश भर में करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं और राजनेताओं की तस्वीरें सुर्खियां बटोरती हैं, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि देखरेख और पानी के अभाव में मानसून बीतते-बीतते इनमें से अधिकांश पौधे दम तोड़ देते हैं। हमें यह समझना होगा कि केवल ‘पौधरोपण’ कर देना ही पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को पूरा नहीं करता; असली काम ‘पौध-संरक्षण’ का है, जिसमें लगाए गए पौधों को पेड़ बनने तक सुरक्षित रखना शामिल है।

सामाजिक जागरूकता के मोर्चे पर हमारी सबसे बड़ी चूक यह है कि हमने पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकार, गैर-सरकारी संगठनों या वन विभाग की जिम्मेदारी मान लिया है। जब तक हर नागरिक के भीतर यह चेतना नहीं जागेगी कि कटता हुआ हर एक पेड़ उनके खुद के अस्तित्व को संकट में डाल रहा है, तब तक कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता। आज समाज में इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि पेड़ लगाना केवल एक शौक या सरकारी कार्यक्रम नहीं है; असल में यह हमारी सांसों का बीमा है। हमें अपने बच्चों को बचपन से ही किताबों से निकालकर मिट्टी और पेड़ों से जोड़ना होगा, ताकि वे पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बन सकें। एयर कंडीशनर या एयर प्यूरीफायर कभी भी एक हरे-भरे पेड़ का विकल्प नहीं हो सकते; वृक्ष का अर्थ सीधे तौर पर पानी, शुद्ध हवा और जीवन से जुड़ा है।

इस वर्ष के वन महोत्सव को केवल शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों तक सीमित न रखकर एक वास्तविक जन-आंदोलन बनाना होगा, जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने जीवन के विशेष अवसरों—जैसे जन्मदिन, शादी या किसी प्रियजन की स्मृति में—कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए और उसे बड़ा करने की पूरी जिम्मेदारी ले। जब तक हर घर से एक ‘वृक्ष मित्र’ नहीं निकलेगा और सामुदायिक स्तर पर पौधों की सुरक्षा का बीड़ा नहीं उठाया जाएगा, तब तक पर्यावरण का यह गंभीर संकट दूर नहीं होगा। आइए, इस बार सिर्फ फोटो खिंचवाने या औपचारिकता निभाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, समृद्ध पानी और एक सुरक्षित भविष्य का उपहार देने के सच्चे संकल्प के साथ इस वन महोत्सव को एक सामाजिक क्रांति का रूप दें।

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