अर्चना त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुआ दर्दनाक अग्निकांड जिसमें बेकसूर लोगों, खासकर मासूम बच्चों और महिलाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी, उसे महज़ एक ‘दुर्घटना’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी मासूमों की ‘संस्थागत हत्या’ है। हर बार जब ऐसा कोई वीभत्स अग्निकांड देश या प्रदेश को झकझोरता है, तो कुछ दिनों के लिए तंत्र जागता है, जांच कमेटियां बैठती हैं, मुआवजे के चेक बांटे जाते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। लेकिन इस बार सवाल सीधे तौर पर उस आपराधिक सांठगांठ पर है जिसने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए मासूमों की जिंदगी को बारूद के ढेर पर बिठा दिया। आखिर इन मासूमों की मौत का असली गुनहगार कौन है?
यह अग्निकांड हमारे शहरी विकास के उस खोखले और जानलेवा मॉडल को बेनकाब करता है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और रिहायशी इलाकों में न तो अग्नि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते हैं, न ही आपातकालीन निकास की व्यवस्था। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि यह सब कुछ स्थानीय प्रशासन, दमकल विभाग और नगर निगम की नाक के नीचे होता रहता है। क्या बिना रिश्वत और सांठगांठ के इन असुरक्षित और अवैध इमारतों को एनओसी मिल जाती है? जब तक कोई बड़ी त्रासदी नहीं होती, तब तक जिम्मेदार अधिकारी फाइलों पर आँखें मूंदकर दस्तखत करते रहते हैं। यह लापरवाही ही असल में वह हथियार है जिससे इन मासूमों की जान ली गई है।
अब समय आ गया है कि महज ‘हादसे’ का रोना रोकर फाइलों को दबाने की रवायत को बदला जाए। इस अग्निकांड के असली दोषियों—चाहे वे रसूखदार बिल्डर-मालिक हों या फिर वे भ्रष्ट अधिकारी जिन्होंने सुरक्षा मानकों की अनदेखी की—उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। जब तक कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदार लोगों की सीधी आपराधिक जवाबदेही तय नहीं होगी और उन्हें सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक ऐसी जलती हुई इमारतों में मासूमों की चीखें गूंजती रहेंगी। सरकार को अब कागजी कार्यवाहियों से ऊपर उठकर एक सख्त नजीर पेश करनी होगी, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी या व्यापारी चंद सिक्कों के लिए इंसानी जिंदगियों का सौदा करने की जुर्रत न कर सके।















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